दोपहर का समय था। कमरे में हल्की धूप आ रही थी। एसी चल रहा था लेकिन फिर भी माहौल भारी था।
सिव्यांश बिस्तर के पास बैठा था। उसके सामने नीवी लेटी हुई थी। वह अभी भी बेहोश थी। उसके ऊपर कंबल ठीक से डाला हुआ था। उसका चेहरा शांत लग रहा था, लेकिन उसकी हालत देखकर साफ समझ आ रहा था कि वह अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं है।
सिव्यांश की आँखों में चिंता थी। वह बार-बार उसे देख रहा था।
“नीवी… उठ जाओ…” उसने धीरे से कहा, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
उसने अपने हाथों से अपना चेहरा रगड़ा। रात की सारी बातें उसके दिमाग में घूम रही थीं। उसे खुद पर गुस्सा आ रहा था, लेकिन उससे भी ज्यादा डर लग रहा था—नीवी के रिएक्शन से।
तभी दरवाज़े पर नॉक हुई।
सिव्यांश उठा और दरवाज़ा खोला। वेटर खाना रखकर चला गया। सिव्यांश ने ट्रे को टेबल पर रख दिया लेकिन उसका ध्यान कहीं और था।
समय धीरे-धीरे बीतता रहा।
घड़ी में 3 बजने वाले थे।
अचानक बिस्तर पर हलचल हुई।
नीवी की उंगलियाँ हिलीं। फिर उसकी आँखें धीरे-धीरे खुलीं।
वह कुछ सेकंड तक छत को देखती रही। जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि वह कहाँ है।
फिर उसने साइड में देखा—
सामने सिव्यांश खड़ा था।
दोनों की नज़रें मिलीं।
कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।
सिव्यांश ने धीरे से कहा, “तुम ठीक हो?”
लेकिन नीवी ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह धीरे-धीरे उठकर बैठ गई। उसने तुरंत कंबल को अपने चारों तरफ कसकर पकड़ लिया।
उसकी आँखों में हैरानी थी… और एक अजीब-सी दूरी।
वह बिना कुछ बोले बिस्तर से उतरी।
सिव्यांश ने फिर कहा, “नीवी, एक मिनट… मेरी बात—”
लेकिन वह रुकी नहीं।
वह सीधे बाथरूम में चली गई और दरवाज़ा बंद कर लिया।
बाथरूम के अंदर—
नीवी आईने के सामने खड़ी थी।
उसने धीरे-धीरे खुद को देखा।
कुछ सेकंड तक वह बस खड़ी रही।
फिर उसने गहरी साँस ली।
उसे रात की बातें याद आने लगीं—थोड़ी साफ, थोड़ी धुंधली।
उसने आँखें बंद कर लीं।
“ये क्या हो गया…” उसने बहुत धीरे से कहा।
उसका सिर अभी भी भारी था।
वह शॉवर के नीचे चली गई। उसने गर्म पानी चालू किया।
पानी उसके ऊपर गिर रहा था लेकिन उसका ध्यान कहीं और था।
वह बस खड़ी रही… बिना हिले।
कुछ देर बाद उसने जल्दी से नहाया और बाहर आई।
उसने साड़ी पहनी। अपने आप को ठीक किया।
चेहरा बिल्कुल सीधा था। कोई एक्सप्रेशन नहीं।
जैसे ही वह बाहर आई—
सिव्यांश तुरंत खड़ा हो गया।
“नीवी, प्लीज़ मेरी बात सुनो—”
लेकिन उसने उसकी तरफ देखा तक नहीं।
वह सीधे दरवाज़े की तरफ चल दी।
सिव्यांश घबरा गया।
“रुको यार… ऐसे मत जाओ…”
नीवी दरवाज़े तक पहुँची।
सिव्यांश उसके पीछे गया।
“तुम कुछ तो बोलो…”
इस बार नीवी रुकी।
लेकिन उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
कुछ सेकंड की चुप्पी रही।
फिर उसने धीरे से कहा—
“क्या बोलूँ?”
उसकी आवाज़ शांत थी, लेकिन अंदर बहुत कुछ दबा हुआ था।
सिव्यांश कुछ बोल नहीं पाया।
नीवी ने आगे कहा—
“जो हुआ… वो बदल सकता है क्या?”
सिव्यांश चुप रहा।
नीवी ने खुद ही जवाब दे दिया—
“नहीं।”
अब वह धीरे-धीरे उसकी तरफ मुड़ी।
उनकी आँखें मिलीं।
“तो फिर बात करने का क्या मतलब है?”
सिव्यांश ने कहा, “मतलब है… क्योंकि—”
“क्योंकि क्या?” नीवी ने बीच में ही रोक दिया।
उसकी आँखों में अब दर्द दिख रहा था।
“तुम explain करोगे? या justify?”
सिव्यांश ने सिर झुका लिया।
“मैं… बस ये कहना चाहता हूँ कि—”
“बस रहने दो,” नीवी ने कहा।
“मैं और कुछ सुनना नहीं चाहती।”
कुछ सेकंड की चुप्पी रही।
फिर उसने बहुत धीरे से कहा—
“मुझे जाना है।”
सिव्यांश ने तुरंत कहा, “मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ—”
“ज़रूरत नहीं है।”
उसने साफ मना कर दिया।
“मैं खुद चली जाऊँगी।”
सिव्यांश ने आखिरी बार कोशिश की—
“नीवी, प्लीज़… ऐसे मत जाओ…”
नीवी ने उसकी तरफ देखा।
इस बार उसकी आँखों में आँसू थे।
लेकिन वह रोई नहीं।
“अगर मैं रुक गई… तो शायद मैं कमजोर पड़ जाऊँगी,” उसने कहा।
“और मैं अभी कमजोर नहीं पड़ना चाहती।”
यह सुनकर सिव्यांश बिल्कुल चुप हो गया।
नीवी ने दरवाज़ा खोला।
और बाहर चली गई।
सिव्यांश भी उसके पीछे बाहर आया।
कॉरिडोर में वह तेज़-तेज़ चल रही थी।
“नीवी!” उसने आवाज़ दी।
लेकिन वह नहीं रुकी।
वह आगे बढ़ती रही।
सिव्यांश उसके पास पहुँचा और उसका हाथ पकड़ लिया।
“एक मिनट—”
नीवी ने तुरंत अपना हाथ छुड़ा लिया।
“मत पकड़ो मुझे,” उसने कहा।
उसकी आवाज़ अब थोड़ी सख्त थी।
सिव्यांश ने हाथ पीछे कर लिया।
“सॉरी…” उसने धीरे से कहा।
नीवी कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।
फिर बोली—
“सॉरी से सब ठीक हो जाता है क्या?”
सिव्यांश के पास कोई जवाब नहीं था।
नीवी ने गहरी साँस ली।
“मुझे टाइम चाहिए,” उसने कहा।
“बहुत सारा।”
फिर वह मुड़ी और चल दी।
इस बार सिव्यांश ने उसे नहीं रोका।
वह बस वहीं खड़ा रहा।
उसे जाते हुए देखता रहा।
नीवी नीचे लॉबी में पहुँची।
उसने बाहर जाकर एक कैब बुलाई।
उसके हाथ अब भी हल्के-हल्के काँप रहे थे।
लेकिन उसने खुद को संभाल रखा था।
कैब आई।
वह अंदर बैठ गई।
दरवाज़ा बंद हुआ।
कैब चल पड़ी।
ऊपर—
सिव्यांश अब भी कॉरिडोर में खड़ा था।
उसने धीरे से दीवार के सहारे खुद को टिकाया।
उसकी आँखें बंद हो गईं।
“सब बिगड़ गया…” उसने खुद से कहा।
नीचे सड़क पर—
कैब आगे बढ़ रही थी।
नीवी खिड़की के बाहर देख रही थी।
उसकी आँखों में आँसू थे—
लेकिन वह उन्हें गिरने नहीं दे रही थी।
उसके दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—
“अब आगे क्या…?”
यहीं से कहानी का असली मोड़ शुरू होता है।
Poonam Kumawat
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Golu Kumar
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Anu Garg
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