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कोई पूछे कि कौन हूँ मैं... कोई पूछे कि कौन हू..

कोई पूछे कि कौन हूँ मैं...


कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,
भीड़ बहुत है इस दुनिया में, पर मेरे कोई पास नहीं।
पढ़ सकते हैं लफ्ज़ मेरे, पर समझें वो एहसास नहीं,
लिखे कितने दर्द यहाँ, पर मिलते सही अल्फ़ाज़ नहीं।

कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,
दिल में उठते जज़्बात कई, पर मन में कोई साज़ नहीं,
हर चेहरा मुझको जानता है, पर मेरा कोई नाम नहीं।
मैं टूटा हुआ वो आईना हूँ, जिसमें झूठा अंदाज़ नहीं।


कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,
चलता हूँ राहों पर तनहा, साथ में कोई आस नहीं।
धड़कन चलती रहती है बस, उसमें कोई आवाज़ नहीं।
हँसता हूँ मैं महफ़िलों में, पर दिल में कोई राग नहीं।

कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,
मंज़िल खुद पूछे मुझसे, तेरा खुद पर विश्वास नहीं?
आईना रोज़ टटोलता है, पर देता कोई जवाब नहीं,
चेहरे सब पहचानते हैं, पर मेरी कोई पहचान नहीं।

कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,
नींदों में भी सुकून मिल सके, ऐसी कोई रात नहीं।
मैं वो लफ़्ज़ हूँ टूटा सा, जिसकी कोई किताब नहीं,
मैं वो दरिया हूँ सूखा सा, जिसकी कोई प्यास नहीं।

कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,
भीतर जितनी रोशनी है, उतनी बाहर बात नहीं।
कोई पूछे फिर भी मुझसे, दुनिया में कुछ खास नहीं?
मुस्काकर बस इतना कहता हूँ, शायद मैं ही खास नहीं।
~ देव श्रीवास्तव " दिव्यम " ✍️

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