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18+ content he to jise आपत्ति है वो इससे दूर रहे। राजवीर ने उसे देखा — और बस इतना कहा, “आज तुझे सिर्फ छूना नहीं… तुझे खुद में बसा लेना है।”


फिर उसके होंठ उसकी जाँघों से ऊपर की ओर बढ़े, जहाँ हर चुम्बन उसके पूरे अस्तित्व को हिला रहा था। और उसकी उँगलियाँ — अब धीरे-धीरे उसे उस गहराई तक महसूस करवा रही थीं, जहाँ से कनक की सिसकी "आह्ह… हुकुम सा…" बन कर बाहर निकली।


कनक की सिसकी कमरे की दीवारों में गूंज गई थी। “आह्ह… हुकुम सा…” उसके काँपते होठों से निकली ये पुकार राजवीर के सीने में जैसे आग बनकर उतर गई।


उसने कनक के चेहरे को अपने दोनों हाथों में लिया — और उसकी आँखों में झाँका… वो आँखें अब सवाल नहीं कर रही थीं… वो तो जैसे खुद जवाब बन चुकी थीं। राजवीर उसके ऊपर झुका… और अपने होठों से उसके माथे पर एक लंबा, गहरा चुम्बन छोड़ा।


फिर उसकी नाक की पुल पर… फिर उसके गालों पर… और फिर उन कांपते होठों पर — जहाँ से अभी-अभी उसका नाम निकला था।



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एक बंधन... जो रस्मों से जुड़ा था, मगर इश्क़ ने उसे आग बना दिया... राजस्थान की शान से भरे एक छोटे से रजवाड़े में दो अनजान लोग, एक अनदेखे बंधन में बंध जाते हैं। ये शादी सिर्फ परिवारों की मर्जी से हुई थी... ना कोई जान-पहचान, ना कोई मोहब्बत ।
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