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मैं यह करूँगी... मैं ठाकुरों के पास जाऊँगी। मैं तु..

मैं यह करूँगी... मैं ठाकुरों के पास जाऊँगी। मैं तुम सबको मरते हुए नहीं देख सकती।"


उत्तर प्रदेश के एक गाँव में, जहाँ गरीबी और तूफ़ान का कहर है, 19 वर्षीय मिष्ठी अपने परिवार को बचाने के लिए एक भयानक फैसला लेने को मजबूर है। बाहर का तूफ़ान मिष्ठी के मन में चल रही उथल-पुथल से कहीं कम है, क्योंकि भूख, ठंड और माँ की बीमारी ने उनके घर को निराशा के कगार पर ला दिया है।

यह कहानी त्याग, गरीबी की मार, पितृसत्तात्मक समाज की कठोरता और एक युवा लड़की के अडिग संकल्प की मार्मिक दास्तान है। अगली सुबह, जब तूफ़ान गुज़र जाता है और सन्नाटा छा जाता है, मिष्ठी अपने भाग्य को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाती है।

यह एक ऐसी कहानी है जहाँ एक बेटी का बलिदान ही उसके पूरे परिवार के लिए जीने की आखिरी उम्मीद बन जाता है।

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