वेदिका प्रलय की कार में बैठी थी। लेकिन आज उसके चेहरे पर वही पुरानी बेचैनी लौट आई थी।
फोन वाली बात उसके दिमाग में बार-बार घूम रही थी।
प्रलय ड्राइव कर रहा था, लेकिन उसकी नजरें बीच-बीच में वेदिका पर भी जा रही थीं।
“तुम अभी भी उसी कॉल के बारे में सोच रही हो?” उसने पूछा।
वेदिका ने हल्का सा सिर हिलाया।
“मुझे समझ नहीं आ रहा… वो चाहता क्या है।”
प्रलय की आवाज़ ठंडी हो गई।
आप लोगों की जिम्मेदारी है कि आप इस द्वार को फिर से सुरक्षित करें।
लेकिन याद रखें—अंधकार सिर्फ बाहर नहीं है।
यह आपके भीतर भी हो सकता है।
जो भी इसे संभालेगा, उसे अपने डर और लालच पर काबू पाना होगा।”
वैदेही ने धीरे कहा—
“तो इसका मतलब… हमारी असली परीक्षा अभी शुरू हो रही है।”
ऋत्विक ने सिर हिलाया।
विक्रम ने हल्की कड़वाहट से हँसते हुए कहा,
“क्योंकि इस ऑफिस में हर कोई जल्दी निष्कर्ष निकाल लेता है… जैसे आप लोग अभी निकाल रहे थे।”
कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
आर्यव ने पूछा,
“फिर कल रात क्या हुआ?”
विक्रम की नजरें थोड़ी गंभीर हो गईं।
“मैं रात को आया… और सीधे उसी केबिन के पास छिप गया। मुझे लगा आज वह इंसान जरूर आएगा।”
आरोही ने धीरे से पूछा,
मर्यादाओं में बंधी एक डोर....
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